विचार

लोकतंत्र की आत्मा हैं संवैधानिक मूल्य

बाबूलाल नागा

    भारत का संविधान केवल एक विधिक दस्तावेज नहीं बल्कि न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व पर आधारित राष्ट्र निर्माण का संकल्प है। यह केवल शासन चलाने की व्यवस्था नहीं, बल्कि एक ऐसे समाज की परिकल्पना है जहां प्रत्येक नागरिक को गरिमा के साथ जीने, समान अवसर प्राप्त करने और बिना किसी भेदभाव के अपने अधिकारों का उपयोग करने का अवसर मिले।

    26 नवंबर 1949 को संविधान सभा द्वारा संविधान को अंगीकार करते समय डॉ. भीमराव आंबेडकर ने कहा था कि संविधान कितना भी अच्छा क्यों न हो, यदि उसे लागू करने वाले लोग अच्छे नहीं होंगे तो वह भी अच्छा परिणाम नहीं देगा। वहीं यदि संविधान में कमियां हों, लेकिन उसे लागू करने वालों की नीयत और कार्यशैली अच्छी हो, तो वह भी सफल सिद्ध होगा। आज के दौर में यह विचार पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक दिखाई देता है।

    आज आवश्यकता इस बात की है कि भारत का प्रत्येक नागरिक संविधान को केवल एक पुस्तक के रूप में न देखे, बल्कि उसे अपने जीवन और समाज का मार्गदर्शक माने। संविधान की मूल भावना सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय पर आधारित है। यह धर्म, जाति, भाषा, लिंग या जन्म के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव को अस्वीकार करता है। इसके बावजूद आज भी समाज में जातीय भेदभाव, सामाजिक असमानता और अवसरों की विषमता अनेक रूपों में मौजूद है।

    संविधान सभी नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण संगठन बनाने और लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखने का अधिकार देता है। लोकतंत्र की आत्मा असहमति और संवाद में निहित होती है। किसी भी लोकतांत्रिक समाज में विचारों का मतभेद राष्ट्रविरोध नहीं, बल्कि स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान होता है। इसलिए आलोचना और असहमति को सम्मानपूर्वक स्वीकार करना लोकतांत्रिक संस्कृति की अनिवार्य शर्त है।

    संविधान ने शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, भोजन और सम्मानजनक जीवन को सामाजिक न्याय के व्यापक दृष्टिकोण से जोड़ा है। राज्य का दायित्व है कि वह आर्थिक और सामाजिक असमानताओं को कम करे तथा समाज के कमजोर वर्गों को आगे बढ़ने के समान अवसर उपलब्ध कराए। अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य वंचित वर्गों के लिए आरक्षण जैसी व्यवस्थाएं इसी संवैधानिक सोच का परिणाम हैं।

    आज यह भी आवश्यक है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था केवल रोजगार तक सीमित न रहे, बल्कि विद्यार्थियों को संविधान, लोकतांत्रिक मूल्यों, नागरिक अधिकारों और मूल कर्तव्यों की भी जानकारी दे। जब तक नई पीढ़ी संविधान की भावना को नहीं समझेगी, तब तक लोकतंत्र केवल चुनावों तक सीमित होकर रह जाएगा।

     संविधान नागरिकों को केवल अधिकार ही नहीं देता, बल्कि कर्तव्यों का भी बोध कराता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाना, महिलाओं के सम्मान की रक्षा करना, सामाजिक भेदभाव समाप्त करना, पर्यावरण एवं प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा करना तथा राष्ट्रीय एकता और अखंडता को मजबूत करना प्रत्येक नागरिक का दायित्व है। इन मूल कर्तव्यों का पालन किए बिना संविधान की भावना को पूर्ण रूप से साकार नहीं किया जा सकता।

    आज जब विकास, लोकतंत्र और सामाजिक न्याय पर निरंतर चर्चा हो रही है, तब यह आवश्यक है कि हमारी नीतियां संविधान के मूल सिद्धांतों के अनुरूप हों। ऐसा विकास, जो समानता, न्याय, मानव गरिमा और सामाजिक समता को मजबूत करे, वही राष्ट्र को वास्तविक अर्थों में आगे ले जा सकता है।

    संविधान में निहित मूल्य केवल शासन के लिए नहीं, बल्कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति के लिए मार्गदर्शक हैं। यदि सरकारें, संस्थाएं और नागरिक समान रूप से इन मूल्यों का पालन करें, तभी भारत एक सशक्त, समावेशी, न्यायपूर्ण और लोकतांत्रिक राष्ट्र के रूप में आगे बढ़ सकेगा। संविधान पर विश्वास ही लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति है और यही विश्वास भारत के उज्ज्वल भविष्य की सबसे मजबूत नींव भी है।

 

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