विचार

क्या विकसित भारत 2047 का लक्ष्य 2075 में हासिल होगा?

कमलेश पांडेय यदि आप विकसित भारत 2047 का स्वप्न देख रहे हैं तो थोड़ा संभल जाइए क्योंकि कुछ अर्थशास्त्रियों ने…

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लोकतंत्र की आत्मा हैं संवैधानिक मूल्य

बाबूलाल नागा     भारत का संविधान केवल एक विधिक दस्तावेज नहीं बल्कि न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व पर आधारित…

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भारतीय राजनीति में मर्यादाहीन आचरण और भाषाई अभद्रता चरम पर

संदीप सृजन-विनायक फीचर्स भारतीय राजनीति का इतिहास विचारों में मतभिन्नता, वैचारिक बहस और लोकतांत्रिक मूल्यों से समृद्ध रहा है। लेकिन…

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महातीर्थस्थल : तीर्थराज गया

(पं. शिवप्रसाद पाठक – विभूति फीचर्स) गया का नाम आते ही हिंदुओं तथा बौद्धों का नतमस्तक होना स्वाभाविक है। श्राद्ध…

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बड़े सपने,कड़ी मेहनत बड़ी सफलता

संजीव ठाकुर, रायपुर छत्तीसगढ़ मन ही मन यदि आपने किसी कठिन कार्य को करने का संकल्प ले लिया तो निरंतर…

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आशापूर्णा देवी की अनंत यात्रा

एक ऐसी लेखनी, जिसने कागज के पन्नों को नहीं, बल्कि समाज की गहरी चेतना को छुआ और उसे नई दिशा दी। आशापूर्णा देवी—वह साहित्यकार, जिनकी रचनाओं ने रूढ़ियों की बेड़ियों को तोड़ा और नारी की अस्मिता को एक नया आकाश प्रदान किया। 8 जनवरी 1909 को कोलकाता के एक परंपरागत मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मीं आशापूर्णा ने वह हासिल किया, जो उनके समय की सामाजिक व्यवस्था में असंभव-सा प्रतीत होता था। स्कूल की औपचारिक शिक्षा से वंचित होने के बावजूद, उनके घर का साहित्यिक और कलात्मक माहौल उनकी रचनात्मकता का पहला स्कूल बना। उनके पिता एक कुशल चित्रकार थे, तो मां बांग्ला साहित्य की गहरी प्रेमी। घर में नियमित आने वाली पत्रिकाएं—प्रवासी, भारतवर्ष, और सबूज पत्र—उनके लिए ज्ञान का अथाह सागर थीं। यहीं से उनकी लेखन यात्रा शुरू हुई, जिसने भारतीय साहित्य को एक ऐसी धरोहर दी, जो आज भी उतनी ही प्रासंगिक, प्रेरक और जीवंत है। मात्र तेरह वर्ष की उम्र में आशापूर्णा ने अपनी लेखनी से वह जादू रचा, जो समाज की बंदिशों को चुनौती देने वाली सशक्त आवाज बनकर उभरा। 1922 में उनकी पहली कविता बाइरेर डाक शिशु साथी पत्रिका में प्रकाशित हुई। यह केवल एक कविता नहीं थी, बल्कि एक ऐसी बालिका की हुंकार थी, जो रूढ़ियों के बीच अपनी पहचान तलाश रही थी। कविता की सीमाओं को लांघकर, उन्होंने जल्द ही कहानियों और उपन्यासों की दुनिया में कदम रखा। उनकी रचनाओं ने नारी जीवन के उन अनछुए पहलुओं को उजागर किया, जो अब तक साहित्य की परछाइयों में दबे थे। उनके पात्र काल्पनिक नहीं, बल्कि उस समाज के जीवंत चित्र थे, जहां स्त्रियां अपने अधिकारों और स्वतंत्रता के लिए मूक संघर्ष कर रही थीं। उनकी कहानियों में नारी की पीड़ा, आकांक्षाएं और विद्रोह इतनी गहराई और संवेदना के साथ उभरते थे कि पाठक स्वयं को उन पात्रों की यात्रा में खो देता था। आशापूर्णा की अमर त्रयी—प्रथम प्रतिश्रुति, सुबर्णलता, और बकुल कथा—ने नारी चेतना को न केवल बांग्ला साहित्य, बल्कि समूचे भारतीय साहित्य में नया आलोक प्रदान किया। प्रथम प्रतिश्रुति की नायिका सत्यवती एक ऐसी क्रांतिकारी स्त्री है, जो अपने युग की रूढ़ियों के खिलाफ न केवल स्वयं के लिए, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वतंत्रता और आत्मसम्मान का मार्ग प्रशस्त करती है। इस कृति ने 1965 में साहित्य अकादमी पुरस्कार और 1976 में ज्ञानपीठ पुरस्कार जीतकर इतिहास रचा, जिसने आशापूर्णा को यह सम्मान पाने वाली पहली महिला बनाया। यह पुरस्कार उनकी लेखन प्रतिभा का नहीं, बल्कि उन असंख्य स्त्रियों की अनसुनी आवाज का उत्सव था, जिन्हें समाज ने सदियों तक चुप रहने को मजबूर किया। सुबर्णलता में उन्होंने एक ऐसी मां की कहानी बुनी, जो अपनी बेटी को आत्मनिर्भरता और साहस का पाठ पढ़ाती है, जबकि बकुल कथा में पारिवारिक जीवन की जटिलताओं को उकेरते हुए उन्होंने प्रेम और कर्तव्य के बीच के नाजुक संतुलन को मार्मिक ढंग से चित्रित किया। यह त्रयी नारी के संघर्ष और उसकी असीम संभावनाओं का एक ऐसा दस्तावेज है, जो हर पाठक को झकझोरता और प्रेरित करता है। आशापूर्णा की लेखनी का जादू उनकी सहजता और यथार्थ की गहरी समझ में छिपा था। उनकी भाषा में न तो अनावश्यक अलंकरण था, न ही बनावटी भावनाओं का प्रदर्शन। वे रोजमर्रा की जिंदगी को शब्दों में इस तरह पिरोती थीं कि हर कहानी पाठक के दिल में उतर जाती थी, मानो उनकी अपनी ही कथा हो। उनकी रचनाएं समाज की कुंठा, लोभ और पाखंड को बेनकाब करती थीं, फिर भी उनमें एक ऐसी आशावादी चमक थी, जो पाठकों को नई प्रेरणा देती थी। उनकी लेखनी में नारी का स्वातंत्र्य और गरिमा एक प्रखर दीप्ति के साथ उभरती थी, जो भारतीय परिप्रेक्ष्य में नारी के संघर्ष को जीवंत रूप देती थी। वे पाश्चात्य नारीवाद की राह नहीं अपनाती थीं, बल्कि भारतीय नारी की पीड़ा, आकांक्षाओं और विद्रोह को अपनी रचनाओं में सशक्त आवाज देती थीं। उनकी कहानियां नारी उत्पीड़न को उजागर करती थीं, मगर साथ ही एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था की वकालत करती थीं, जहां नारी को समानता का अधिकार मिले—एक ऐसा सपना, जो उनकी लेखनी में जीवंत हो उठता था। उनकी रचनाशीलता केवल वयस्क साहित्य तक सीमित नहीं रही। आशापूर्णा ने बच्चों के लिए भी ऐसी कहानियां और कविताएं रचीं, जो मनोरंजन के साथ-साथ जीवन मूल्यों और नैतिकता को सहजता से सिखाती थीं। उनका बाल साहित्य बच्चों की जिज्ञासा और संवेदनाओं को इस तरह उकेरता था कि वह हर आयु के पाठक को मोह लेता था। लगभग 225 कृतियों में 100 से अधिक उपन्यास और हजारों कहानियां समेटने वाली उनकी लेखनी का अनुवाद भारत की कई भाषाओं में हुआ, जो उनकी रचनाओं की सार्वभौमिकता और अपार लोकप्रियता का प्रमाण है। उनकी हर कृति एक ऐसी मशाल है, जो पाठकों को न केवल रोमांचित करती है, बल्कि समाज को बदलने का साहस भी देती है। आशापूर्णा का जीवन स्वयं में एक प्रेरणा की मिसाल था। एक ओर वे गृहिणी के…

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डोभाल की ललकार और झूठ की चादर फाड़ते सैटेलाइट

जब भारत की हुंकार गूंजी, तो दुश्मन की नींद उड़ गई। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने जब पाकिस्तान के…

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सफलता भाग्य का नहीं परिश्रम का पुरस्कार

संजीव ठाकुर जहां सफलता की संभावना एकदम कम तथा न्यून हो और सफलता मिल जाए तो भाग्य को श्रेय दिया…

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मुनीर बनाम जरदारी की जंग

प्रो. आरके जैन “अरिजीत” पाकिस्तान की धरती पर सियासी तूफान की आहट एक बार फिर गूंज रही है, मानो इतिहास का चक्र…

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अवरोध नही उत्पादक बने जनसंख्या

संजीव ठाकुर भारत एक दशक के बाद सबसे ज्यादा जनसंख्या वाला देश होगा और सबसे ज्यादा युवा जनसंख्या वाला भी…

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