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हमीरपुर बुलडोजर मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के जजों में मतभेद, मामला तीसरे जज को भेजा जाएगा

प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट के दो जजों की खंडपीठ ने हमीरपुर जिले में बुलडोजर कार्रवाई और पाक्सो एक्ट के बहुचर्चित मामले में मतभिन्नता के कारण मामले पर सुनवाई को तीसरे जज के लिए रेफर कर दिया है। यह मतभिन्नता फैमुद्दीन एवं अन्य की याचिका पर न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन एवं न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ के आदेश में आई, जिसमें संपत्ति सील करने और ध्वस्तीकरण की आशंका को लेकर संवैधानिक संरक्षण मांगा गया था।

दोनों न्यायाधीशों के बीच दो अहम कानूनी बिंदुओं पर मतभिन्नता (1) अनुच्छेद 226 के तहत दो साल की सामान्य रोक लगाई जा सकती है या नहीं और (2) नगरीय कानून के तहत कार्रवाई से एक साल पहले नोटिस ऑफ इंटेंट देना अनिवार्य किया जा सकता है या नहीं, के कारण यह मामला मुख्य न्यायाधीश के पास भेजा जाएगा, जो इसे किसी तीसरे न्यायाधीश या पीठ को सौंपेंगे। तब तक याचियों की आवासीय संपत्ति को लेकर राज्य सरकार ने स्पष्ट किया कि फिलहाल कोई कार्रवाई प्रस्तावित नहीं है जबकि आरा मिल के विरुद्ध वन अधिनियम के तहत कार्रवाई यथावत जारी रहेगी। इंडियन लॉज, जो आपराधिक मामले में घटनास्थल है, का केस प्रॉपर्टी के रूप में बीएनएसएस के प्रावधानों के तहत निस्तारण किया जाएगा।

याचियों का कहना था कि उनकी रिश्तेदार आफान खान के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 64(1), 62/351(3), 61(2), आईटी एक्ट की धारा 67, पॉक्सो एक्ट की धारा 3/4 और यूपी गैरकानूनी धर्मांतरण निषेध अधिनियम के तहत केस दर्ज है। आरोप है कि आफान खान का याचियों की संपत्तियों आवासीय मकान, इंडियन लॉज नामक व्यावसायिक प्रतिष्ठान और आरा मिल में कोई स्वामित्व नहीं है। इसके बाद भी बिना नोटिस या सुनवाई के इन संपत्तियों को सील करने और ध्वस्त करने की कार्रवाई की जा रही है, जिसे उन्होंने सामूहिक दंड और भीड़तंत्र जैसी राजनीतिक रूप से संरक्षित कार्रवाई बताया।

सुप्रीम कोर्ट के बुलडोजर जजमेंट का दिया हवाला

न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन ने सुप्रीम कोर्ट के बुलडोजर जजमेंट (इन रि डायरेक्शंस इन द मैटर ऑफ डिमॉलिशन ऑफ स्ट्रक्चर्स) का हवाला देते हुए कहा कि किसी आरोपी के घर को केवल इसलिए ध्वस्त करना कि उस पर आपराधिक मामला दर्ज है, प्रतिशोधात्मक कार्यकारी विवेकाधिकार माना जाएगा। उन्होंने निर्देश दिया कि एफआईआर दर्ज होने की तारीख से दो वर्ष तक किसी आरोपी का घर ध्वस्त न किया जाए, जब तक कि सार्वजनिक भूमि पुनः प्राप्त करने की तत्काल आवश्यकता न हो और कार्रवाई केवल आरोपी के घर तक सीमित न हो। साथ ही कोई व्यक्ति तीन वर्ष या उससे अधिक समय से अवैध निर्माण में रह रहा है तो प्राधिकरण को नगरीय कानून के तहत कार्रवाई शुरू करने से एक वर्ष पहले सूचना देनी होगी ताकि वह वैकल्पिक व्यवस्था कर सके।

कोर्ट को समय सीमा तय करने का अधिकार नहीं

खंडपीठ में शामिल न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन ने जस्टिस श्रीधरन के फैसले से आंशिक असहमति जताते हुए कहा कि अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट को दो साल जैसी कोई निश्चित समयसीमा तय करने का अधिकार नहीं है क्योंकि इससे कानून का प्रवर्तन उतने समय के लिए स्थगित हो जाएगा। उन्होंने आशंका जताई कि इस तरह की छूट का दुरुपयोग हो सकता है। लोग कानूनी कार्रवाई से बचने के लिए जानबूझकर तुच्छ मुकदमे या एफआईआर दर्ज करा सकते हैं ताकि दो साल की सुरक्षा का लाभ उठाया जा सके। उन्होंने इसे अवांछित न्यायिक सक्रियता और विधायिका के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप बताया। उन्होंने ध्वस्तीकरण से पहले एक वर्ष के नोटिस ऑफ इंटेंट वाली शर्त को भी कानून में प्रावधान न होने के आधार पर अस्वीकार किया।

दोषी अफसरों के खिलाफ कार्रवाई पर दिखाई सहमति

हालांकि, दोनों न्यायाधीश इस बात पर सहमत रहे कि निर्माण उल्लंघन को लेकर नोटिस जारी किया जाता है, तो संबंधित दोषी अधिकारियों के विरुद्ध भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत समानांतर कार्रवाई भी शुरू की जानी चाहिए और उसे छह महीने के भीतर तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाया जाना चाहिए। दोनों ने यह भी माना कि विकास प्राधिकरण की कार्रवाई किसी एक व्यक्ति के विरुद्ध चुनिंदा नहीं होनी चाहिए अन्यथा पीड़ित पक्ष अदालत का रुख कर सकता है।

फैसले में न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन ने सुपरटेक बनाम एमराल्ड कोर्ट और एशा एकता अपार्टमेंट्स में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि अवैध निर्माणों के लिए अकेले उल्लंघनकर्ता ही नहीं बल्कि निर्माण को मंजूरी देने वाले विकास प्राधिकरण के अधिकारी भी उतने ही जिम्मेदार हैं। दोनों के बीच अक्सर मिलीभगत पाई जाती है। कोर्ट ने कहा कि सिर्फ आम नागरिक के अवैध निर्माण को गिराना पर्याप्त नहीं बल्कि लापरवाह अधिकारियों पर भी कार्रवाई जरूरी है।

अपर महाधिवक्ता ने कहा तथ्य छिपाए गए

अपर महाधिवक्ता अनूप त्रिवेदी ने कोर्ट को बताया कि याचिका में तथ्य छिपाए गए हैं। उन्होंने कहा कि इंडियन लॉज सिंचाई विभाग की जमीन पर बना है और 2021 की एक जनहित याचिका में पहले से ही अतिक्रमण हटाने के आदेश हैं। आपराधिक मामले के संदर्भ में बताया गया कि 16 वर्षीय नाबालिग के साथ रेप, आपत्तिजनक वीडियो बनाने, ब्लैकमेल व धर्म परिवर्तन के लिए दबाव बनाने का गंभीर आरोप है और यह घटना इसी लॉज में हुई। जांच में याची फैमुद्दीन की भूमिका भी सामने आई और उसे गिरफ्तार कर जेल भेजा जा चुका है। आरा मिल पर वन विभाग की ओर से अलग कार्रवाई चल रही है क्योंकि वहां संरक्षित प्रजाति की लकड़ी बरामद हुई थी।

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