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छपास रोग के सस्ते हथकंडे, मुझे जीवन में कभी न भाये…!

​सभी शब्द अपनी नजरों में,
सर्वश्रेष्ठ किसको कहें।
जब भी लिखता रहा निरंतर,
दिल से ही लिखते रहें ॥

​हमेशा अधूरा मानता हूँ,
जब भी कोशिशें करता हूँ।
सर्वश्रेष्ठ की सच्ची आशा में,
भूख-प्यास में गढ़ता हूँ ॥

​कितना छपा और क्या न छपा,
यह मृगतृष्णा सा जीवन में।
सदा भागता रहा यहाँ-वहाँ,
लिखता रहा, खोकर मन में ॥

​57 बरस का यह जुनून,
कई मुकाम अच्छे-बुरे आये।
ना घबराकर हर मुश्किल से,
अपनी लेखनी को चमकाए ॥

​छपास रोग के सस्ते हथकंडे,
मुझे जीवन में कभी न भाये।
“माणिक” कलम की धार मेरी,
जीवन में प्रकाश बिखराए ॥

– मदन वर्मा “माणिक”
   इंदौर, मध्यप्रदेश 

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