जनकपुर-अयोध्या महामार्ग विश्व का प्राचीनतम महामार्ग: प्रो. हरिबंश झा

अयोध्या और जनकपुर एक ही अक्षांश रेखा पर अवस्थित: प्रो. हरिबंश झा
बलराम मौर्य/ बालजी हिन्दी दैनिक
अयोध्या l डॉ. राममनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय के इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग के सेमिनार हॉल में एक विशेष व्याख्यान ‘जनकपुर अयोध्या महामार्ग की खोज’ पर कुलपति कर्नल डॉ बिजेंद्र सिंह के निर्देशन में किया गया। मुख्य वक्ता सेंटर फार इकोनोमिक एण्ड टेक्निकल स्टडीज, जनकपुर, नेपाल के कार्यकारी निदेशक प्रो. हरिबंश झा रहे।
हरिवंश झा ने बताया कि जनकपुर तथा अयोध्या को रामायणकाल मे जोड़ने वाले महामार्ग को वर्तमान परिवेश मे चिन्हित करने की बृहद् परियोजना पर कार्य कर रहे हैं। महाप्रभु श्रीराम का जन्म 17000 से 5000 ईशापूर्व में हुआ। संदर्भित काल मे भी अयोध्या और जनकपुर थलमार्ग से जुड़े हुए थे। इसी मार्ग से प्रभु श्रीराम की बारात जनकपुर तक गई थी। आगे बताया कि संदेशवाहक को अयोध्या से जनकपुर पहुँचने में कुल चार दिन लगते थे। जबकि प्रभु श्रीराम की बारात को मिथिला तक पहुँचने में कुल तेरह दिन लगे थे। प्रो. हरिबंश झा ने एक और रहस्योद्घाटन करते हुए बताया कि अयोध्या और जनकपुर एक ही अक्षांश रेखा पर अवस्थित हैं जैसे कि केदारनाथ और रामेश्वरम् एक ही देशाँतर पर हैं। उन्होंने बताया कि अयोध्या और जनकपुर का थलमार्ग द्वारा जुड़ा होना दोनों के मध्य व्यापार और वाणिज्य को प्रोत्साहित करता था। दोनों राज्यों के मध्य वैवाहिक संबंधों ने इस संबंध को और भी प्रगाढ़ कर दिया था। दोनों ही स्थान, अयोध्या तथा जनकपुरी में, दोनों की स्मृतियाँ आज भी सुरक्षित है। प्रो. हरिबंश झा स्वयं इस पथ पर पैदल चल कर प्रमुख स्थलों को चिन्हित कर चुके है जो प्रभु श्रीराम और माता सीता से संबंधित है और इसके स्थानीय लोगों का साक्षात्कार लेकर और वृद्ध लोगों से भी जानकारी एकत्र कर चुके हैं। झा द्वारा किए जा रहे कार्य से आने वाले समय में नेपाल-अयोध्या संबंध पर आगे का कार्य करने हेतु शोधछात्रों को प्रोत्साहन मिलेगा।
कार्यक्रम की अध्यक्षता इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्त्व विभाग के अध्यक्ष डाॅ. संजय चौधरी ने ने किया उन्होंने अपने उद्बोधन में कहा कि अयोध्या विश्व की एक सांस्कृतिक धरोहर है। इसकी प्राचीनता सांस्कृतिक धार्मिक एवं ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण है। डाॅ. देवनरायण वर्मा ने प्रो. हरिबंश झा के शोध कार्य को महत्वपूर्ण ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक खोज के क्षेत्र में महत्वपूर्ण संदर्भ बताया। इस अवसर पर त्रिभुवन विश्वद्यिालय काठमण्डू के प्रो. शम्भूनाथ झा, डॉ अवध नरायन, डाॅ. देशराज उपाध्याय, शोधछात्र ज्ञान प्रकाश तिवारी, निधि कुमारी तथा उषा वर्मा के अतिरिक्त बड़ी संख्या मे परास्नातक के छात्र उपस्थित रहे।





