
रिकवरी से रोज़गार तक मान सरकार का ‘युद्ध नशे के विरुद्ध’ अभियान, नशा छोड़ने वालों को रोज़गार के ज़रिए ज़िंदगी फिर से संवारने में मदद कर रहा है
चंडीगढ़; 21 जून 2026:
पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान के नेतृत्व में चल रहे ‘युद्ध नशे के विरुद्ध’ अभियान की पहचान अब उन लोगों की कहानियों से हो रही है, जिन्होंने नशा छोड़ने के बाद रोज़गार पाकर अपनी ज़िंदगी को नई दिशा दी है। जो लोग कभी नशे की लत से जूझ रहे थे, वे अब होटलों, रेस्तरां, शॉपिंग मॉल और D-Mart, Blinkit जैसी जगहों पर काम करके या अपना छोटा-मोटा काम शुरू करके अपनी ज़िंदगी फिर से संवार रहे हैं।
मार्च 2025 में राज्य में ‘युद्ध नशे के विरुद्ध’ अभियान शुरू होने के बाद से, पंजाब भर के नशा मुक्ति केंद्रों में इलाज पूरा करने वाले कई लोगों को रोज़गार मिला है। इससे पता चलता है कि कैसे रोज़गार लंबे समय तक नशे से दूर रहने और बेहतर ज़िंदगी जीने की दिशा में मदद कर सकता है।
इनमें दलजिंदर सिंह (बदला हुआ नाम) भी शामिल हैं, जिन्होंने फरवरी 2026 में D-Mart आउटलेट में काम करना शुरू किया। उन्होंने काम की ज़रूरतों को बखूबी समझा है और धीरे-धीरे अपनी ज़िंदगी को पटरी पर ला रहे हैं। दलजिंदर कहते हैं, “नौकरी मिलने से मुझे हर सुबह उठने का एक मकसद मिला। इससे मेरा आत्मविश्वास बढ़ा। अब ज़िंदगी अच्छी लग रही है… यहाँ तक कि सुबह की एक कप चाय भी मेरे चेहरे पर मुस्कान ले आती है।”
प्रवीण ढल, जिन्हें किराने का सामान, फल, सब्ज़ियाँ और रोज़मर्रा की अन्य ज़रूरी चीज़ें तेज़ी से डिलीवर करने वाली सर्विस में नौकरी मिली, कहते हैं, “रिहैबिलिटेशन (नशा मुक्ति प्रक्रिया) ने मुझे जीवित रहने में मदद की, लेकिन नौकरी ने मुझे फिर से जीना सिखाया। जब मैंने कमाना शुरू किया, तो मैंने खुद को एक ऐसे नशेड़ी के तौर पर देखना बंद कर दिया जो ठीक होने की कोशिश कर रहा है, बल्कि खुद को ज़िम्मेदारियों और भविष्य वाले इंसान के तौर पर देखने लगा। इसी एहसास ने मुझे नशे से दूर रखा।”
‘युद्ध नशे के विरुद्ध’ अभियान सिर्फ़ नशा मुक्ति तक ही सीमित नहीं है। इसका एक उदाहरण जालंधर नशा मुक्ति केंद्र में देखने को मिलता है, जहाँ नशा छोड़ने के बाद मुख्यधारा में लौटे लोगों की प्रगति पर नज़र रखी जाती है और यह देखा जाता है कि कहीं वे दोबारा नशे की लत की ओर तो नहीं बढ़ रहे हैं।
फॉलो-अप के दौरान पाया गया कि कई लोग रोज़गार में लगे हुए हैं, जो उनके परिवार और समाज में फिर से घुलने-मिलने और आर्थिक रूप से मज़बूत होने की दिशा में एक अहम कदम है। जैसे-जैसे ज़्यादा लोग इलाज केंद्रों से निकलकर नौकरी और अपना काम (सेल्फ़-एम्प्लॉयमेंट) शुरू कर रहे हैं, मुख्यमंत्री भगवंत मान के ‘युद्ध नशे के विरुद्ध’ अभियान का असर अब सिर्फ़ गिरफ़्तारियों और ज़ब्ती से नहीं, बल्कि लोगों की ज़िंदगी संवरने और रोज़गार के मौक़े मिलने से भी मापा जा रहा है।
नशे के शिकार लोगों को इस लत से बाहर निकालने में अहम भूमिका निभाने वाले काउंसलर का कहना है कि इलाज से रोज़गार की ओर बढ़ना सफल रिहैबिलिटेशन (पुनर्वास) का सबसे मज़बूत संकेत हो सकता है।
अमृतसर मेडिकल कॉलेज के स्वामी विवेकानंद ड्रग डी-एडिक्शन सेंटर की काउंसलर भावना शर्मा ने कहा, “रिकवरी का मतलब सिर्फ़ नशा छोड़ना नहीं है। हम मरीज़ों को अपनी भावनाएं ज़ाहिर करने, अपनी ज़िंदगी को फिर से संवारने और भविष्य के लिए लक्ष्य तय करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। जब उन्हें रोज़गार और एक स्थिर ज़िंदगी की राह दिखने लगती है, तो वे नशा-मुक्त रहने के लिए और ज़्यादा प्रतिबद्ध हो जाते हैं।”
‘युद्ध नशे के विरुद्ध’ अभियान के तहत जालंधर डी-एडिक्शन सेंटर के नोडल साइकियाट्रिस्ट डॉ. अभय राज सिंह ने कहा, “ऐसी सफलता की कहानियाँ नशा-मुक्ति के इलाज को रिहैबिलिटेशन और रोज़गार में मदद से जोड़ने की अहमियत को बताती हैं। ठीक होकर काम पर लौटने वाला हर व्यक्ति न सिर्फ़ अपनी निजी जीत हासिल करता है, बल्कि एक मज़बूत परिवार और सुरक्षित समुदाय का भी निर्माण करता है।”
जैसे-जैसे ज़्यादा लोग इलाज केंद्रों से निकलकर नौकरी और अपना काम शुरू कर रहे हैं, इस अभियान का असर अब सिर्फ़ गिरफ़्तारियों और ज़ब्ती से नहीं, बल्कि लोगों की ज़िंदगी संवरने, रोज़गार के साधन फिर से बनने और भविष्य बेहतर होने से भी मापा जा रहा है।
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