रुद्रपुर मेडिकल कॉलेज: 5 करोड़ का टेंडर सवालो के घेरे में, क्या पारदर्शिता से समझौता हुआ?

अनुपम खत्री
देहरादून /रुद्रपुर- राजकीय मेडिकल कॉलेज में करीब 5 करोड़ की खरीद प्रक्रिया से जुड़े दस्तावेज़ जब सामने आए, तो एक सामान्य सरकारी टेंडर से कहीं बड़े सवाल खड़े होने लगे। उपलब्ध रिकॉर्ड ऐसी विसंगतियों की ओर संकेत करते हैं जिन्हें सामान्य प्रशासनिक चूक कहकर नज़रअंदाज़ करना आसान नहीं है। सबसे गंभीर प्रश्न BOQ (Bill of Quantity) से जुड़ा है। उपलब्ध दस्तावेज़ों के अनुसार कई उपकरणों की तकनीकी स्पेसिफिकेशन स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं थीं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि बोलीदाता आखिर किस आधार पर अपनी वित्तीय बोली तैयार करते।
रिकॉर्ड बताते हैं कि चार प्रतिभागी कंपनियों में से एक ने विभाग को लिखित आपत्ति भेजकर यही प्रश्न उठाया था। कंपनी ने अनुरोध किया कि प्रत्येक उपकरण की पूरी तकनीकी स्पेसिफिकेशन उपलब्ध कराई जाए, ताकि वह नियमों के अनुरूप अपनी बिड तैयार कर सके। लेकिन उपलब्ध दस्तावेज़ों में उस आपत्ति के समाधान का कोई स्पष्ट रिकॉर्ड दिखाई नहीं देता। इसके बाद टेंडर प्रक्रिया आगे बढ़ी, तकनीकी और वित्तीय बिड का मूल्यांकन हुआ और अंततः वही कंपनी अयोग्य घोषित कर दी गई जिसने स्पेसिफिकेशन की मांग उठाई थी।
यहीं से पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न लगना शुरू हो जाता है। किसी भी सरकारी टेंडर में BOQ केवल एक सूची नहीं होती, बल्कि वही दस्तावेज़ सभी प्रतिभागियों के लिए समान अवसर सुनिश्चित करता है। यदि तकनीकी जानकारी ही पर्याप्त रूप से उपलब्ध न हो, तो यह पूछना अनुचित नहीं कि क्या सभी बोलीदाता वास्तव में समान जानकारी के आधार पर प्रतिस्पर्धा कर रहे थे।
उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार अंततः तीन कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा दिखाई देती है और L-1 कंपनी को कार्यादेश मिल जाता है। इसके बाद खरीदे गए कुछ उपकरणों की कीमतों की तुलना खुले बाज़ार में उपलब्ध समान श्रेणी के उत्पादों से करने पर भी कई प्रश्न सामने आते हैं। यदि बाज़ार मूल्य और स्वीकृत दरों में उल्लेखनीय अंतर दिखाई देता है, तो यह जानना आवश्यक हो जाता है कि खरीद समिति ने मूल्य परीक्षण किस आधार पर किया। क्या स्वतंत्र मार्केट सर्वे कराया गया था? क्या मूल्य अंतर का कोई दस्तावेज़ी औचित्य दर्ज है? यदि है, तो उसे सार्वजनिक क्यों नहीं किया जाता?
इस पूरे मामले में एक और महत्वपूर्ण विरोधाभास सामने आता है। रुद्रपुर और हल्द्वानी मेडिकल कॉलेज के तत्कालीन प्राचार्यों का कहना है कि टेंडर समिति और BOQ उन्हें निदेशालय से उपलब्ध कराए गए थे। दूसरी ओर, निदेशालय का पक्ष इससे अलग बताया जाता है। यदि दोनों पक्षों के रिकॉर्ड और बयान अलग-अलग दिशा में इशारा करते हैं, तो यह केवल प्रशासनिक भ्रम का मामला नहीं रह जाता; यह निर्णय प्रक्रिया की जवाबदेही का प्रश्न बन जाता है। आखिर BOQ किसने तैयार की? तकनीकी समिति किस स्तर पर गठित हुई? और अंतिम प्रशासनिक जिम्मेदारी किसकी थी?
इन सवालों के बीच तत्कालीन निदेशक *डॉ. अजय आर्या* ने मीडिया के कैमरे पर इस पूरे मामले की जांच कराने का आश्वासन दिया था। यदि जांच का आश्वासन दिया गया था, तो यह अपेक्षा भी स्वाभाविक है कि उससे संबंधित आदेश, जांच रिपोर्ट या निष्कर्ष सार्वजनिक रिकॉर्ड में उपलब्ध हों। यदि ऐसी कोई कार्रवाई हुई है, तो उसे सामने लाया जाना चाहिए; और यदि नहीं हुई, तो यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि जांच की स्थिति क्या है।
यह पूरा प्रकरण केवल ₹5 करोड़ की खरीद का नहीं है। यह उस व्यवस्था की विश्वसनीयता का प्रश्न है जिसके भरोसे सार्वजनिक धन खर्च किया जाता है। उपलब्ध दस्तावेज़ कई ऐसे प्रश्न उठा रहे हैं जिनका उत्तर केवल बयानबाज़ी से नहीं, बल्कि रिकॉर्ड, जांच और पारदर्शिता से ही दिया जा सकता है। जब एक पक्ष BOQ और समिति की जिम्मेदारी निदेशालय पर डालता हो, दूसरा पक्ष इससे इनकार करता हो, और रिकॉर्ड में उठे तकनीकी प्रश्न आज भी अनुत्तरित हों, तब यह मामला स्वतः ही गहन प्रशासनिक परीक्षण की मांग करता है।
*अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या इन सभी तथ्यों का कोई सरल प्रशासनिक स्पष्टीकरण है, या फिर यह पूरी प्रक्रिया एक स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच की मांग करती है? जनता का पैसा खर्च हुआ है, इसलिए जवाब भी जनता के सामने आने चाहिए।
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