संवैधानिक मर्यादा और संघीय स्वायत्तता के मध्य गहराता संकट

भारतीय संविधान की संघीय संरचना देश की अखंडता और प्रशासनिक संतुलन की वह आधारशिला है, जिसमें केंद्र एवं राज्यों के मध्य शक्तियों का विभाजन अत्यंत स्पष्टता के साथ किया गया है। सातवीं अनुसूची के अंतर्गत कानून-व्यवस्था राज्यों का अनन्य अधिकार क्षेत्र है, किंतु मनी लॉन्ड्रिंग, आर्थिक अपराध और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे अंतरराज्यीय प्रभाव वाले विषयों पर केंद्र को व्यापक अधिकार प्राप्त हैं। वर्तमान परिदृश्य में यह रेखांकित करना आवश्यक है कि शक्तियों का यह विभाजन किसी भी स्तर पर अराजकता या संस्थागत टकराव का लाइसेंस प्रदान नहीं करता।
संस्थागत टकराव और संवैधानिक चुनौतियां प्रवर्तन निदेशालय (ED) जैसी केंद्रीय एजेंसियां संसद द्वारा निर्मित वैधानिक ढांचे के अंतर्गत कार्य करती हैं, जिनकी जांच शक्ति को सर्वोच्च न्यायालय ने भी समय-समय पर वैध ठहराया है। इसके बावजूद, पश्चिम बंगाल और झारखंड जैसे राज्यों में घटित हालिया घटनाएं एक चिंताजनक प्रवृत्ति की ओर संकेत करती हैं। बंगाल में प्रवर्तन निदेशालय की छापेमारी के दौरान स्वयं मुख्यमंत्री का हस्तक्षेप, साक्ष्यों के साथ संभावित छेड़छाड़ और राज्य पुलिस द्वारा केंद्रीय एजेंसी पर प्राथमिकी दर्ज करना न केवल प्रशासनिक विफलता है, बल्कि संघीय ढांचे की मूल भावना पर भी आघात है।
न्यायपालिका का हस्तक्षेप और केंद्र का दायित्व सुप्रीम कोर्ट द्वारा राज्य पुलिस की एफआईआर पर रोक लगाना और सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित रखने जैसे निर्देश इस बात का स्पष्ट प्रमाण हैं कि न्यायपालिका भी इसे एक गंभीर ‘संस्थागत संकट’ मान रही है। झारखंड में केंद्रीय एजेंसी के कार्यालय पर राज्य पुलिस की कार्रवाई भी इसी दबाव की राजनीति का विस्तार प्रतीत होती है।
संविधान का अनुच्छेद 355 केंद्र सरकार को यह उत्तरदायित्व सौंपता है कि वह प्रत्येक राज्य में संवैधानिक व्यवस्था का अनुपालन सुनिश्चित करे। एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि वर्तमान केंद्र सरकार ने निर्वाचित राज्य सरकारों को बर्खास्त करने के संदर्भ में अत्यधिक संयम का परिचय दिया है, जबकि अतीत में अनुच्छेद 356 का दुरुपयोग एक सामान्य परिपाटी थी। दुर्भाग्यवश, इस लोकतांत्रिक संयम को कुछ राज्य सरकारों ने केंद्र से अनावश्यक टकराव और स्वयं को एक ‘स्वतंत्र सत्ता केंद्र’ के रूप में स्थापित करने का माध्यम बना लिया है।
निष्कर्ष भारत एक संप्रभु और एकीकृत गणराज्य है। यदि राज्य सरकारें जांच एजेंसियों की राह में अवरोध उत्पन्न करेंगी और संघीय ढांचे को अपनी राजनीतिक ढाल बनाएंगी, तो यह देश को संस्थागत अविश्वास और विखंडन की ओर ले जाएगा। समय की मांग है कि राष्ट्रीय एकता और कानून के शासन को सर्वोपरि रखते हुए, केंद्रीय एजेंसियों की स्वायत्तता की रक्षा की जाए और हर उस कृत्य पर सख्ती बरती जाए जो संवैधानिक अनुशासन को चुनौती देता है।




