जहाँ जाओ, संस्कृत का वातावरण बनाओ – डॉ. धनञ्जय कुमार आचार्य

रिपोर्ट सनोज मिश्रा
उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान द्वारा संचालित ऑनलाइन संस्कृत भाषा शिक्षण कक्षा के अंतर्गत प्रेरणा सत्र आयोजन के क्रम में सत्र का आरंभ डॉ. निवेदिता द्वारा लौकिक मंगलाचरण से हुआ। संस्थान की गीतिका समता महोदया ने स्वागत गीत प्रस्तुत किया, जबकि संस्थान के प्रशिक्षक गणेश द्विवेदी महोदय ने अतिथियों का परिचय कराते हुए सभी का स्वागत किया।
प्रशिक्षुओं में हृषिकेश, समृद्धि गुप्ता, पद्मा अग्रवाल, गौरी आदि ने अनुभव कथन और गीत प्रस्तुत किए। प्रशिक्षक शशिकांत ने कार्यक्रम की रूपरेखा और संयोजन किया। प्रेरणा सत्र के वक्ता डॉ. धनंजय कुमार आचार्य ने अपने उद्बोधन में संस्कृत भाषा के महत्व के विषय में कहा कि जहां जाएंगे, संस्कृत बोलेंगे, वहीं संस्कृत का प्रचार और प्रसार होगा और उसी से संस्कृत युग आएगा।
डॉ. आचार्य ने कहा कि जब हम संस्कृत का आचरण करेंगे, तभी संस्कृत का वातावरण बनेगा। यदि हम अपने जीवन में छोटे-छोटे वाक्यों का प्रयोग संस्कृत में करते हैं, तो समाज हमारे व्यवहार से प्रेरित होगा। इससे संस्कृत बोलने में समर्थ लोगों की भावना को बल मिलेगा।
प्राचीन काल में वेद, पुराण, उपनिषद आदि संस्कृत भाषा में थे। उस समय न केवल ग्रंथ संस्कृत में थे, बल्कि लोकभाषा भी संस्कृत ही थी। भाषा भावों और विचारों के प्रकटीकरण के लिए होती है। सभी संस्कृत के विषय में चिंतन करें और संस्कृत का प्रचार और प्रसार करें।
प्रशिक्षक विनोद कुमार त्रिपाठी ने अतिथियों के प्रति कृतज्ञता प्रकट की। पंकज शर्मा महोदय ने तकनीकी सहायता प्रदान की। सत्र का सुव्यवस्थित संचालन प्रशिक्षक शशिकांत महोदय ने किया। अंत में प्रशिक्षक विनोद कुमार त्रिपाठी ने सभी के लिए आवश्यक सूचनाएं दीं।
कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान के निदेशक विनय श्रीवास्तव, प्रशासनिक पदाधिकारी जगदानंद झा, दिनेश मिश्र, योजना प्रमुख भगवान सिंह चौहान, प्रशिक्षण प्रमुख सुधिष्ठ कुमार मिश्र, समन्वयक धीरज मैठाणी, दिव्य रंजन, राधा शर्मा आदि के साथ सभी प्रशिक्षक गण उपस्थित थे।





