क्षेत्रीय स्तर पर वायु प्रदूषण का हो सकेगा सटीक आंकलन: डॉ विनोद कुमार चौधरी

बलराम मौर्य/ बालजी हिन्दी भाषा
अयोध्या। डॉ. राममनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञान विभाग को उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से “वायु गुणवत्ता अनुश्रवण”. (मॉनिटरिंग) परियोजना के अंतर्गत अत्याधुनिक उपकरण प्राप्त हुए हैं। कुलपति कर्नल डॉ बिजेंद्र सिंह के महत्वपूर्ण निर्देशन में सभी उपकरण वायु गुणवत्ता पर निगरानी और शोध के क्षेत्र में विभाग की क्षमताओं को अपग्रेड करेंगे। उपकरणों में आठ रेस्पिरेबल डस्ट सैंपलर (आरडीएस) पीएम10 की निगरानी के लिए और आठ पीएम ₂.₅ सैंपलर सूक्ष्म कणों के लिए तथा एक अतिसूक्ष्म जो उच्च शुद्धता द्वारा फिल्टर पर जमा कणों का वजन मापने में सहायक होगा। इन सभी यंत्रों की आपूर्ति विश्वविद्यालय को हो गई है। इनकी अनुमानित कुल लागत ₹50 लाख से अधिक बताई जा रही है। पर्यावरण संरक्षण एवं शोध परियोजनाओं के क्षेत्र में यह एक उल्लेखनीय कदम है। इन यंत्रों की आपूर्ति से इससे विभाग को उच्च स्तरीय पर्यावरण में हो रहे बदलाव के मापन की क्षमता प्राप्त होगी। इससे विभाग में शोध और प्रशिक्षण दोनों स्तरों पर सुविधा बढ़ेगी। विभागाध्यक्ष डॉ. विनोद कुमार चौधरी के नेतृत्व में यह परियोजना आरंभ की जा रही है। उन्होंने बताया कि उपकरणों का ट्रायल रन सफलतापूर्वक पूरा हो चुका है। अब इन्हें चार जिलों—अंबेडकर नगर, गोंडा, बहराइच और श्रावस्ती—में चयनित स्थलों पर स्थापित किया जाएगा जिससे क्षेत्रीय स्तर पर वायु प्रदूषण की सटीक स्थिति का पता लगाया जा सके। इस परियोजना के क्रियान्वयन के लिए शोध सहायकों और फील्ड असिस्टेंट्स की नियुक्ति प्रक्रिया अभी चल रही है। नियुक्ति के बाद, सभी को विश्वविद्यालय में प्रशिक्षण दिया जाएगा। एक सितंबर से संबंधित जिलों में उपकरणों को स्थापित कर सावधानीपूर्वक संचालन सुनिश्चित हो सकें। यह समय सीमा स्पष्ट करती है कि शीघ्र ही सभी यंत्र क्रियाशील हो जाएंगे। डॉ. चौधरी ने बताया कि यह उपलब्धि विश्वविद्यालय के लिए एक बड़ी सफलता बताते हुए कहा यह वह अवसर है जब किसी सरकारी एजेंसी द्वारा इस प्रकार का तकनीकी सहयोग हमारे विभाग को प्राप्त हो रहा है। इससे हमारे छात्र एवं शोधार्थी वास्तविक जीवन की परिस्थितियों में प्रशिक्षित हो सकेंगे और भविष्य में सक्षम पर्यावरण वैज्ञानिक बनेंगे। यह पहल न केवल शोध और शिक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह प्रदेश में वायु प्रदूषण प्रबंधन और नीति निर्माण में भी एक प्रभावी योगदान दे सकती है। रियल-टाइम डेटा एकत्रित हो सकने से जिलेवार प्रदूषण स्रोतों का विश्लेषण, नियंत्रण रणनीतियाँ विकसित करने और समुदाय को सचेत करने में भी मदद मिलेगी।





