हिमाचल एंट्री टैक्स के विरोध में ‘खालसा टैक्स’ पर छिड़ा सियासी विवाद, निहंगों ने दिया 10 दिन का अल्टीमेटम

चंडीगढ़। हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा वाहनों पर लगाए गए एंट्री टैक्स के विरोध में निहंगों द्वारा शुरू किए गए प्रतीकात्मक “खालसा टैक्स” को लेकर पंजाब की राजनीति गरमा गई है। विपक्षी दलों ने इस मुद्दे पर पंजाब सरकार को घेरते हुए आरोप लगाया है कि वह लंबे समय से चले आ रहे एंट्री टैक्स विवाद का समाधान निकालने में विफल रही है।
बुधवार को निहंगों के एक समूह ने किरतपुर साहिब-मनाली राष्ट्रीय राजमार्ग पर हिमाचल प्रदेश में पंजीकृत वाहनों से लगभग एक घंटे तक स्वैच्छिक योगदान (चंदा) एकत्र किया। निहंगों का कहना है कि यह अभियान हिमाचल सरकार द्वारा 1 अप्रैल से एंट्री टैक्स 50 रुपये से बढ़ाकर 100 रुपये किए जाने के विरोध में प्रतीकात्मक कदम है।
इस घटनाक्रम के बाद सोशल मीडिया पर भी बहस तेज हो गई है। विपक्षी नेताओं का आरोप है कि दोनों राज्य सरकारें इस विवाद का समाधान निकालने में असफल रही हैं, जिससे आम लोगों में नाराजगी बढ़ रही है।
पूर्व पंजाब युवा कांग्रेस अध्यक्ष बरिंदर ढिल्लों ने कहा कि एंट्री टैक्स से प्रभावित लोगों की नाराजगी अब खुलकर सामने आने लगी है। उन्होंने आरोप लगाया कि पिछले कई महीनों से विरोध के बावजूद सरकार ने कोई प्रभावी पहल नहीं की।
वहीं सुभाष शर्मा ने एंट्री टैक्स को अनुचित बताते हुए कहा कि हिमाचल भाजपा पहले ही इसे समाप्त करने की बात कह चुकी है। उनका आरोप है कि पंजाब और हिमाचल की सरकारों ने इस मुद्दे को अनावश्यक रूप से लंबा खींच दिया है।
दूसरी ओर, पंजाब के शिक्षा मंत्री हरजोत सिंह बैंस ने उम्मीद जताई कि बातचीत के जरिए जल्द समाधान निकाला जाएगा। उन्होंने कहा कि भगवंत मान और सुखविंदर सिंह सुक्खू इस विषय पर चर्चा कर चुके हैं।
रूपनगर से आम आदमी पार्टी के विधायक दिनेश चड्ढा ने भी कहा कि वह एंट्री टैक्स के विरोध में हैं और दोनों राज्य सरकारों को मिलकर जल्द समाधान निकालना चाहिए।
इस बीच निहंगों ने पंजाब और हिमाचल सरकारों को 10 दिन का अल्टीमेटम दिया है। उनका कहना है कि यदि निर्धारित अवधि में कोई समाधान नहीं निकला तो हिमाचल नंबर की गाड़ियों पर स्थायी रूप से तथाकथित “खालसा टैक्स” लगाया जाएगा।
पंजाब संघर्ष मोर्चा के संयोजक गौरव राणा ने दावा किया कि इस अभियान ने एंट्री टैक्स के खिलाफ जनता के गुस्से को उजागर कर दिया है और सरकारों पर दबाव बढ़ाया है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि प्रस्तावित जवाबी कर नीति को लागू करने में देरी क्यों हो रही है।
अब सभी की निगाहें दोनों राज्य सरकारों की आगामी कार्रवाई और संभावित समाधान पर टिकी हुई हैं।





