झारखण्डराज्य

झारखंड भाजपा में बड़ा सांगठनिक फेरबदल: बाहरी ट्राइबल नेताओं को कमान देने के पीछे क्या है आलाकमान का मास्टरप्लान?

रांची: झारखंड में भाजपा में दो प्रमुख पदों की जिम्मेदारी छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के ट्राइबल नेता को दिए जाने से समीकरण और रणनीति को लेकर चर्चा शुरू हो गई है. क्योंकि इसे सिर्फ पदों की अदला-बदली के तौर पर देखना मुश्किल है. प्रदेश संगठन महामंत्री के तौर पर पवन कुमार साय और प्रदेश प्रभारी के रूप में गजेंद्र सिंह पटेल की नियुक्ति हुई है. दोनों आदिवासी समुदाय से आते हैं. जबकि प्रदेश भाजपा के सबसे बड़े आदिवासी चेहरों में शामिल बाबूलाल मरांडी नेता प्रतिपक्ष की भूमिका में हैं.

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या भाजपा ने झारखंड में आदिवासी राजनीति पर अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए संगठन के शीर्ष स्तर पर यह बदलाव किया है. सवाल यह भी है कि क्या झारखंड भाजपा के आदिवासी नेता अपनी साख गंवा चुके हैं. आखिर बाहर से ट्राइबल नेताओं को लाने की जरूरत क्यों पड़ी. इसको राजनीति के जानकार किस रूप में देख रहे हैं. साथ ही पार्टी का अपना क्या विचार है. इस खास रिपोर्ट में जानिए.

भाजपा के आदिवासी नेताओं में नहीं रहा दम- बैद्यनाथ

वरिष्ठ पत्रकार बैद्यनाथ मिश्रा का दो टूक कहना है कि झारखंड में भाजपा के आदिवासी नेताओं में अब कोई दम नहीं रहा. कहने को बाबूलाल मरांडी, अर्जुन मुंडा और मधु कोड़ा पूर्व सीएम रहे हैं. लेकिन खुद अपनी ट्राइबल सीट नहीं जीत सकते हैं. पिछले चुनावों में यह स्थापित हो चुका है. बाबूलाल मरांडी अनारक्षित सीट से लड़ते हैं. अर्जुन मुंडा खूंटी सीट हार गये. उनकी पत्नी पोटका चुनाव हार गईं. मधु कोड़ा की पत्नी गीता कोड़ा चुनाव हार गईं. लिहाजा, पार्टी आलाकमान को अब लगने लगा है कि प्रदेश स्तर के आदिवासी नेता खुद ट्राइबल के बीच पैठ खो चुके हैं.

पिछले विधान सभा चुनाव में भाजपा को ट्राइबल इलाकों में एक भी सीट नहीं मिली थी. एकमात्र चंपाई सोरेन एसटी सीट पर जीते. जिसमें भाजपा का कोई रोल नहीं है. ऐसे में भाजपा के टॉप लीडर्स समझ चुके हैं कि इनके भरोसे रहने से बात नहीं बनेगी. इसलिए कुछ सोच समझकर ही दो आदिवासी नेताओं को झारखंड में संगठन की बड़ी जिम्मेदारी दी गई है. आलाकमान समझ चुका है कि आदिवासी समाज के बीच साख बनाए बगैर सत्ता तक पहुंचना मुश्किल है.

आदिवासी और दलित को बढ़ावा देने की जरूरत: भाजपा

प्रदेश भाजपा में तीन अहम पदों की जिम्मेदारी आदिवासी समाज के नेताओं को सौंपे जाने के सवाल पर भाजपा का भी पक्ष आया है. प्रदेश प्रवक्ता अभय सिंह का कहना है कि देश में आदिवासी और दलित समाज को बढ़ावा की जरूरत है. इनको सिर्फ वोट बैंक के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. इन दोनों समाज से लीडरशिप तैयार करने की जरूरत है. कल तक यह समाज अंतिम पायदान पर था. इसकी वजह रही कांग्रेस और दूसरी पार्टियां, जो सत्ता में रही. लेकिन भाजपा इस समाज के लोगों को मुख्यधारा से जोड़कर लीडरशिप तैयार कर रही है. इसकी सराहना होनी चाहिए.

विस की 28 ST सीटें भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती

झारखंड विधानसभा की 81 सीटों में 28 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं. राज्य की राजनीति में इन सीटों का महत्व इसलिए भी ज्यादा है, क्योंकि आदिवासी बहुल इलाकों में इनका प्रभाव आरक्षित सीटों से बाहर की कई विधानसभा सीटों तक भी दिखाई देता है. 2000 का चुनाव तकनीकी तौर पर एकीकृत बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान हुआ था. जिसके बाद झारखंड अलग राज्य बना. उस चुनाव में भाजपा ने ST की 28 सीटों में 12 पर जीत दर्ज की थी. 2005 में यह संख्या घटकर 8 और 2009 में 7 रह गई.

2014 में भाजपा ने फिर वापसी करते हुए 11 ST सीटें जीती. लेकिन 2019 में तस्वीर पूरी तरह बदल गई. भाजपा सिर्फ 2 ST सीटें (खूंटी और तोरपा) जीत सकी, जबकि JMM-कांग्रेस गठबंधन ने 28 में 25 सीटें अपने नाम कर ली. 2024 में भाजपा के लिए स्थिति और चुनौतीपूर्ण रही. इस चुनाव में 28 ST आरक्षित सीटों में भाजपा गठबंधन सिर्फ एक सीट जीत सका और 27 सीटें INDIA गठबंधन के खाते में चली गई. 2014 की 11 सीटों से 2024 की एक सीट तक भाजपा का प्रदर्शन लगातार कमजोर हुआ है. यही आंकड़ा बताता है कि आदिवासी बेल्ट भाजपा के लिए फिलहाल सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती में से एक है.

लोकसभा की 5 ST सीटों का समीकरण

झारखंड बनने के बाद पहला लोकसभा चुनाव 2004 में हुआ. अबतक 5 लोकसभा चुनाव हुए हैं. झारखंड की 14 लोकसभा सीटों में से 5 सीटें एसटी के लिए रिजर्व हैं. इनमें राजमहल, दुमका, सिंहभूम, खूंटी और लोहरदगा शामिल है. 2004 में भाजपा ने एक लोस सीट जीती जो अनारक्षित थी. 2009 में 8 सीटें जीती. जिनमें रामहल, खूंटी और लोहरदगा की एसटी सीट शामिल थी.

2014 लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने झारखंड में 12 सीटें जीती. जिनमें सिंहभूम, खूंटी और लोहरदगा की एसटी सीट भी थी. वहीं 2019 में पार्टी ने 11 लोकसभा सीटें जरूर जीती, लेकिन एसटी सीटों की संख्या घटकर 2 रह गई. सिर्फ दुमका और खूंटी की एसटी सीट जीत पायी. लेकिन 2024 में भाजपा एक भी एसटी सीट नहीं जीत सकी. साथ ही सीटों की संख्या घटकर 8 हो गई.

क्या है संगठन का नया स्वरूप

हालिया बदलाव के बाद प्रदेश भाजपा की तस्वीर में कई महत्वपूर्ण चेहरे दिखाई दे रहे हैं. ओबीसी समाज से आदित्य साहू प्रदेश अध्यक्ष हैं. बाबूलाल मरांडी नेता प्रतिपक्ष हैं, जो संथाल आदिवासी है. प्रदेश संगठन महामंत्री की जिम्मेदारी पवन कुमार साय और प्रदेश प्रभारी की जिम्मेदारी गजेंद्र सिंह पटेल को दी गई है. दोनों आदिवासी समाज से आते हैं. वहीं सौरभ सिंह और निवेदिता सिंह सह प्रभारी बनाए गए हैं. भाजपा ने पहली बार झारखंड के लिए दो सह-प्रभारियों की व्यवस्था भी की है.

भाजपा में क्या होती है संगठन महामंत्री की भूमिका

भाजपा में संगठन महामंत्री का पद मुख्य रूप से संगठन और कार्यकर्ताओं के बीच समन्वय से जुड़ा होता है. बूथ से लेकर मंडल और जिला स्तर तक संगठन को सक्रिय रखना, कार्यकर्ताओं के साथ संपर्क, प्रशिक्षण, संगठनात्मक विस्तार, चुनावी तैयारियों और पार्टी की सांगठनिक रणनीति को जमीन तक पहुंचाना, इस भूमिका का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है. पवन साय का छत्तीसगढ़ में करीब एक दशक का संगठनात्मक अनुभव इसलिए महत्वपूर्ण है. क्योंकि 2016 से वह छत्तीसगढ़ भाजपा के प्रदेश संगठन महामंत्री रहे हैं.

प्रभारी की भूमिका क्यों होती है महत्वपूर्ण

प्रदेश प्रभारी केंद्रीय नेतृत्व और राज्य संगठन के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी होते हैं. वह प्रदेश की राजनीतिक-संगठनात्मक स्थिति की रिपोर्ट केंद्रीय नेतृत्व तक पहुंचाते हैं. रणनीति के क्रियान्वयन की निगरानी करते हैं और चुनाव या संगठन से जुड़े महत्वपूर्ण फैसलों में केंद्रीय नेतृत्व और प्रदेश इकाई के बीच समन्वय करते हैं.

छत्तीसगढ़ से पवन, मध्य प्रदेश से गजेंद्र सिंह पटेल क्यों

इस फैसले को भाजपा की बड़ी स्ट्रेटजी के रूप में देखा जा रहा है. पवन साय पड़ोसी राज्य छत्तीसगढ़ से आते हैं और लंबे समय तक वहां संगठन के शीर्ष पद पर काम कर चुके हैं. छत्तीसगढ़ और झारखंड दोनों राज्यों में आदिवासी राजनीति, वन क्षेत्र, जमीन, विस्थापन और आदिवासी पहचान जैसे मुद्दे राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हैं. इसलिए छत्तीसगढ़ का उनका संगठनात्मक अनुभव झारखंड में उपयोगी हो सकता है.

दूसरी तरफ गजेंद्र सिंह पटेल मध्य प्रदेश की खरगोन ST लोकसभा सीट से सांसद हैं और भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव भी हैं. मध्य प्रदेश में गजेंद्र सिंह पटेल आदिवासी समाज के बीच एक कद्दावर नेता के रूप में अपनी पहचान रखते हैं. पटेल का आदिवासी क्षेत्रों में संगठनात्मक अनुभव भी रहा है. वह भाजपा के अनुसूचित जनजाति मोर्चा से जुड़े रहे हैं. इसलिए एक संभावित संदेश यह है कि भाजपा झारखंड में आदिवासी समाज के बीच संगठनात्मक और राजनीतिक संपर्क को नए सिरे से मजबूत करना चाहती है.

क्या यह सिर्फ आदिवासी वोट बैंक की रणनीति है?

झारखंड की राजनीति के जानकारों के मुताबिक, चुनावी आंकड़े बताते हैं कि भाजपा को आदिवासी सीटों पर लगातार नुकसान हुआ है. ऐसे में आदिवासी चेहरों को महत्वपूर्ण संगठनात्मक जिम्मेदारी देना चुनावी दृष्टि से स्वाभाविक रूप से जरूरी हो जाता है. 2014 में भाजपा ने 28 ST सीटों में 11 जीती थी. 2019 में यह संख्या घटकर 2 और 2024 में 1 रह गई.

दूसरी तरफ JMM के नेतृत्व में आदिवासी समर्थन का आधार मजबूत हुआ है. यही नहीं, 2014 से 2024 के बीच ST आरक्षित सीटों पर JMM के वोट शेयर में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की गई है. एक और खास बात ये है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी झारखंड की पांचों ST आरक्षित सीटें हार गई थी. इसलिए भाजपा के सामने चुनौती केवल ST आरक्षित 28 सीटों को जीतने की नहीं है. चुनौती यह भी है कि आदिवासी मतदाताओं के बीच पार्टी की राजनीतिक स्वीकार्यता को फिर से बढ़ाया जाए.

असली परीक्षा चुनावी नतीजों में होगी

सिर्फ आदिवासी नेताओं को खास पद देने से राजनीतिक समीकरण अपने आप नहीं बदलते. झारखंड की आदिवासी राजनीति में जल-जंगल-जमीन, CNT-SPT कानून, सरना धर्म कोड, विस्थापन, वनाधिकार, रोजगार, आदिवासी पहचान और स्थानीय मुद्दे लंबे समय से महत्वपूर्ण रहे हैं. JMM की राजनीति का एक मजबूत आधार आदिवासी अस्मिता और शिबू सोरेन-हेमंत सोरेन की राजनीतिक विरासत है. ऐसे में भाजपा के लिए चुनौती सिर्फ संगठन में आदिवासी चेहरों को आगे बढ़ाने की नहीं, बल्कि इन मुद्दों पर अपनी राजनीतिक विश्वसनीयता मजबूत करने की भी होगी.

अब प्रदेश में एक साथ बाबूलाल मरांडी, पवन कुमार साय और गजेंद्र सिंह पटेल जैसे आदिवासी चेहरों की अलग-अलग सांगठनिक भूमिकाएं हैं. इससे साफ है कि भाजपा आदिवासी राजनीति को केवल चुनाव के समय की रणनीति न रखकर संगठन के नियमित कामकाज का हिस्सा बनाना चाहती है.

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